लाखों श्रद्धालु पहुंचे, लेकिन व्यवस्था पर सवाल: संकट में ‘श्रृंगी ऋषि सेवा फाउंडेशन’ बना सहारा

लाखों श्रद्धालु पहुंचे लेकिन व्यवस्था पर सवाल 


कोशी तक /सिंहेश्वर, मधेपुरा:- सावन की आखिरी सोमवारी पर सिंहेश्वर धाम में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि मंदिर परिसर और आसपास का इलाका श्रद्धालुओं से पट गया। लाखों श्रद्धालु बाबा सिंहेश्वर नाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचे। लेकिन इस अभूतपूर्व भीड़ के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की जानकारी पहले से होने के बावजूद प्रशासन और मंदिर न्यास की तैयारियां आखिर कहां कमजोर पड़ गईं?

श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और उसके साथ व्यवस्था पर दबाव भी बढ़ता गया। रात से ही मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गई थीं। पट खुलने के बाद भीड़ का दबाव अचानक बढ़ा और देखते ही देखते अफरातफरी जैसी स्थिति बन गई। कई श्रद्धालुओं के गिरने और घायल होने की बात सामने आई। इस दौरान भीड़ प्रबंधन, बैरिकेडिंग, मेडिकल सहायता और आपातकालीन निकासी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए।

भीड़ का सैलाब, व्यवस्था बेबस?

अंतिम सोमवारी जैसी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के व्यापक इंतजाम किए जाने का दावा किया गया था। लेकिन मौके की तस्वीर ने कई दावों पर सवाल खड़े कर दिए। भीड़ का दबाव बढ़ने के बाद बैरिकेडिंग पर स्थिति बिगड़ती नजर आई। गेट खुलते ही श्रद्धालुओं का हुजूम तेजी से आगे बढ़ा और कई लोग इसकी चपेट में आ गए।

सबसे गंभीर सवाल इमरजेंसी रिस्पॉन्स को लेकर उठा। जब श्रद्धालु घायल हुए तो उन्हें सुरक्षित और तत्काल अस्पताल तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त आपातकालीन रास्ता और प्रभावी व्यवस्था नजर नहीं आई। भीड़ के बीच स्ट्रेचर और घायलों को निकालना स्वयं एक चुनौती बन गया।

जब सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठे, स्वयंसेवक बने सहारा

इस पूरी स्थिति में स्थानीय स्वयंसेवकों की भूमिका सामने आई। श्रृंगी ऋषि सेवा फाउंडेशन के सदस्य संकट की घड़ी में श्रद्धालुओं की मदद के लिए लगातार जुटे रहे। स्वयंसेवकों ने घायलों को प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराया और गंभीर स्थिति वाले श्रद्धालुओं को बेहतर इलाज के लिए जननायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज पहुंचाने में मदद की।

कई थके और बेसुध डाकबम श्रद्धालुओं को स्वयंसेवकों ने अपने कंधों पर उठाकर सेवा शिविर तक पहुंचाया। घायल श्रद्धालुओं को स्ट्रेचर ट्रॉली से भीड़ से बाहर निकालने का काम किया गया। जब भीड़ के बीच परिजन और प्रशासनिक व्यवस्था परेशान नजर आ रही थी, तब स्वयंसेवकों की टीम लगातार राहत कार्य में लगी रही।

मेडिकल व्यवस्था भी सवालों के घेरे में

अफरातफरी के बाद चिकित्सा शिविर में घायलों और अस्वस्थ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी। चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने मोर्चा संभाला, लेकिन इतनी बड़ी भीड़ के मुकाबले चिकित्सा एवं आपातकालीन व्यवस्था पर्याप्त थी या नहीं, यह भी सवालों के घेरे में है।

आखिरी सोमवारी पर लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना पहले से थी। ऐसे में अतिरिक्त चिकित्सकीय टीम, एंबुलेंस, अलग इमरजेंसी कॉरिडोर और अस्पताल तक तत्काल पहुंच की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित क्यों नहीं की गई—यह सवाल अब उठना स्वाभाविक है।

प्रशासन से सवाल: भीड़ का अनुमान था तो तैयारी कहां थी?

सिंहेश्वर धाम में सावन की आखिरी सोमवारी कोई अचानक आने वाला आयोजन नहीं था। प्रशासन और मंदिर प्रबंधन को पहले से अंदाजा था कि इस दिन भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचेंगे। इसके बावजूद यदि भीड़ के दबाव में व्यवस्था लड़खड़ाती है और श्रद्धालु घायल होते हैं तो जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।

प्रश्न सीधे हैं—

लाखों श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ के अनुरूप बैरिकेडिंग कितनी मजबूत थी?

आपातकालीन निकासी के लिए अलग कॉरिडोर क्यों प्रभावी नहीं था?

भीड़ में घायल श्रद्धालुओं को तत्काल अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था कहां थी?

मेडिकल टीम और एंबुलेंस की संख्या भीड़ के अनुपात में पर्याप्त क्यों नहीं थी?

गेट खोलने के दौरान भीड़ के दबाव को नियंत्रित करने की ठोस रणनीति क्या थी?

मंदिर न्यास ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए क्या अतिरिक्त व्यवस्था की थी?

मंदिर न्यास भी दे जवाब

सिंहेश्वर धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। श्रद्धालु यहां विश्वास लेकर आते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन और न्यास की भी समान जिम्मेदारी है।

श्रद्धालुओं की भीड़ से होने वाली आय और चढ़ावे की व्यवस्था जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धालुओं की जान और सुरक्षा है।

अगर व्यवस्था की कमी के कारण किसी श्रद्धालु को गंभीर नुकसान पहुंचता है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

संकट में स्वयंसेवकों ने दिखाई इंसानियत

अंतिम सोमवारी की तस्वीर का एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। जब व्यवस्था पर सवाल उठे, तब स्थानीय स्वयंसेवकों ने बिना किसी भेदभाव के श्रद्धालुओं की मदद की। श्रृंगी ऋषि सेवा फाउंडेशन के सदस्यों ने घायलों को उठाया, प्राथमिक उपचार दिलाया और जरूरतमंदों को अस्पताल पहुंचाने में सहयोग किया।

लेकिन सवाल यह है कि हर बार संकट आने पर क्या स्वयंसेवकों के भरोसे ही व्यवस्था चलेगी?

श्रद्धालुओं की सुरक्षा किसी स्वयंसेवी संस्था की कृपा पर निर्भर नहीं हो सकती। इसके लिए प्रशासन और मंदिर न्यास को पहले से ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी, जो लाखों की भीड़ में भी काम करे।

अब जवाबदेही तय होनी चाहिए

अंतिम सोमवारी की घटना ने सिंहेश्वर धाम की व्यवस्था की पोल खोलने का काम किया है। आस्था का सैलाब प्रशासन के लिए चुनौती जरूर था, लेकिन यह अप्रत्याशित नहीं था।

अगर पहले से भीड़ का अनुमान था तो फिर व्यवस्था चरमराई क्यों?

अगर सुरक्षा के इंतजाम थे तो श्रद्धालु घायल कैसे हुए?

अगर मेडिकल व्यवस्था मजबूत थी तो घायलों को तत्काल मदद के लिए स्वयंसेवकों पर निर्भर क्यों होना पड़ा?

सवाल सिर्फ एक सोमवारी का नहीं है। सवाल यह है कि अगली बार लाखों श्रद्धालु जब सिंहेश्वर धाम आएंगे तो क्या व्यवस्था उनके स्वागत के लिए तैयार होगी या फिर किसी हादसे के बाद ही सिस्टम जागेगा?

श्रद्धालुओं की सुरक्षा से समझौता नहीं हो सकता। प्रशासन और मंदिर न्यास को इस पूरी व्यवस्था की समीक्षा कर जवाबदेही तय करनी होगी।

क्योंकि आस्था के नाम पर भीड़ बुलाना आसान है, लेकिन उस भीड़ की सुरक्षित जिम्मेदारी उठाना ही असली व्यवस्था की परीक्षा है।

Post a Comment

أحدث أقدم