वट सावित्री व्रत : आस्था, समर्पण और अध्यात्म का प्रतीक

 वटवृक्ष के पास वट सावित्री व्रत की पुजा करती सुहागिनें



कोशी तक सिंहेश्वर मधेपुरा:- सिंहेश्वर प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर सुहागिन महिलाओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ वट सावित्री व्रत मनाया। महिलाओं ने वट वृक्ष की पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना की। इस दौरान मंदिर रोड स्थित पंडा निवास परिसर का वट वृक्ष आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रहा, जहां बड़ी संख्या में विवाहित महिलाएं एकत्रित होकर पारंपरिक विधि-विधान से पूजा करती नजर आईं। महिलाओं ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर धागा बांधा और अपने वैवाहिक जीवन की मंगलकामना की।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट वृक्ष को अमरत्व, स्थिरता और जीवन शक्ति का प्रतीक माना गया है। वेदों, पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में इसका विशेष महत्व बताया गया है। कहीं इसे भगवान शिव का स्वरूप कहा गया है तो कहीं भगवान विष्णु का प्रतीक माना गया है। ज्येष्ठ अमावस्या के दिन रखा जाने वाला वट सावित्री व्रत भारतीय सनातन परंपरा में पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने कठोर तप, अटूट निष्ठा और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यही कारण है कि यह व्रत नारी शक्ति, धैर्य और अटूट प्रेम का संदेश देता है। महिलाएं इस दिन उपवास रखकर वट वृक्ष की पूजा करती हैं तथा 7, 21 या 108 बार परिक्रमा कर पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-शांति की कामना करती हैं।

अध्यात्म की दृष्टि से वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन में विश्वास, संयम, समर्पण और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। वट वृक्ष की विशालता और उसकी लंबी आयु मानव जीवन को यह संदेश देती है कि संबंधों की जड़ें भी विश्वास और त्याग से ही मजबूत होती हैं। यह पर्व भारतीय संस्कृति में नारी के त्याग, प्रेम और आध्यात्मिक शक्ति को सम्मान देने का भी अवसर माना जाता है।

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