घैलाढ़ के श्रीनगर स्थित शिवटिला के पास खेत से फिर बैसाल्ट पत्थर से निर्मित सूर्य भगवान की मूर्ति मिली मूर्ति

श्रीनगर खुदाई में मिली बैसाल्ट पत्थर पर निर्मित सूर्य भगवान की मूर्ति

संवाद सूत्र

घैलाढ़:- प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत श्रीनगर स्थित शिव टीला विभिन्न पुरातात्विक ऐतिहासिक धरोहरों का खजाना है, यहां कई वर्षों से कई ऐतिहासिक मूर्तियां मिल रही है,ऐसे में शुक्रवार को शिवटीला स्थित सरकारी जमीन से जेसीबी द्वारा मिट्टी काटने के दौरान बेसाल्ट पत्थर पर बनी भगवान सूर्य की खड़ी प्रतिमा मिली है। प्रतिमा मिलने से आसपास क्षेत्र में चर्चा का बाजार गर्म है। स्थानीय लोगों का कहना था की यह मूर्ति भगवान विष्णु की प्रतिमा है,


लेकिन इतिहासकार सतीश कुमार से इस मूर्ति के संबंध में जानकारी मांगी गई तो उन्होंने बताया की यह सूर्य भगवान की मूर्ति है उन्होंने कहा की आप ध्यान से देखेंगे तो मूर्ति के दाहिने हाथ में कमल है। मूर्ति का दायां हाथ वरद मुद्रा में है। पद्य आकार पर खड़ी मूर्ति के आधार के नीचे सात अश्व होंगे जो टूट गये है,साथ ही सूर्य भगवान के पैरो में जूता पहना हुआ है जो निश्चित रूप से सूर्य भगवान की ही यह मूर्ति है,मूर्ति कला के दृष्टिकोण से मूर्ति नौंवी व दसवीं शताब्दी की बतायी जा रही है। बताया जा रहा है कि काली बेसाल्ट पत्थर की प्रतिमाओं के अलावा निखत नक्काशी व शिला उत्कीर्ण के नमूने मूर्ति में मौजूद हैं। केन्द्र व बिहार सरकार के अलावे जिला प्रशासन द्वारा उचित ध्यान नहीं देने से पुरातात्विक दुष्टिकोण से महत्वपूर्ण श्रीनगर टीला का अस्तित्व खतरे में है। 



आगे इस संबंध में पुरातत्वविद सह सीओ सतीश कुमार ने बताया कि श्रीनगर टीला के मुख्य स्थलों की यदि खुदाई की जाए तो नौवीं सदी से पूर्व का धरती में छिपे इतिहास का विस्तृत पता चलेगा, उन्होंने बताया कि यहां उत्तर गुप्त काल के अवशेष मिला है। यहां का इतिहास 3000 हजार वर्ष पुरानी धरोहर का जीता जागता सबूत है। जो वैदिक कालीन काला मृदभांड, प्राचीन मिट्टी की मूर्तियां, उत्तर गुप्तकालीन मंदिर के बेसाल्ट के चौखट के शिखर के अवशेष, पत्थर का मगरमच्छ कुषाण कालीन ईंट, वैदिक काल सभ्यता के अवशेष मिल रहे हैं। जिसमें घर बनाने वाले खपरा और मिट्टी के बड़े घड़े भी मिले हैं। 



इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि ईसा पूर्व में यहां बड़ा नगर बसा था । इसके अलावा 2500 साल पुरानी कुशानकालीन ईंट, 1600 साल पुराने उत्तर गुप्तकालीन पत्थर के टुकड़े, 1000 साल पुराने उमा महेश्वर की दुर्लभ प्रतिमाएं भी मिली है।अगर यहां खुदाई कराए तो यह कोशी क्षेत्र के बड़े पर्यटक क्षेत्र के रूप में विकसित हो सकता है। यहां बिखरे शिलाखंड पर बंगला देवनागरी और कैथी की मिश्रित भाषा अंकित है। यहां घरियाल की मुंह की आकृति वाला मकर जल निकासी प्रणाली के भी यह अवशेष मिले हैं जो यहां कालांतर के भव्य शिव मंदिर होने का प्रमाण है।उन्होंने बताया कि राम जन्मभूमि के खुदाई के दौरान भी ऐसे मगड़जल निकासी प्रणाली के अवशेष मिले थे। कोशी क्षेत्र में दूसरी कहीं ऐसी प्रतिमा नहीं है। मालूम हो कि पूर्व डीएम मो.सोहेल को श्रीनगर स्थित उत्तर गुप्त सेवा मंदिर का पर्यटकीय दृष्टिकोण से विकास एवं सौंदर्यकरण के प्रतिवेदन विभाग को भेजा गया था। जिसमें पूर्व डीएम मो. सोहेल द्वारा उमा महेश्वर मंदिर में चारदीवारी से घेराव किया गया था। उन्होंने बताया कि पुरातत्व विभाग की ओर से श्रीनगर टीला की खुदाई की जाए तो यहां प्राचीन अवशेष मिलेंगे। साथ ही उन्होंने कहा यह क्षेत्र पूरी तरह से विकसित क्षेत्र था, जहां हर और खुशहाली थी, खासकर पुरुषों में धोती और कुर्ता का पहनावा चलता था, महिलाएं साड़ी पहनती थी,जबकि मुगलकालीन सभ्यता आने के बाद पहनावा में अंतर आने लगा लेकिन आप सोचिए खासकर के इस सूर्य भगवान की मूर्ति को लेकर ही जो नवीं सदी का कहा जा रहा है। उसे समय इस क्षेत्र में कैसा स्वर्ण युग रहा होगा जिस समय में बैसाल्ट पत्थर पर उस समय के तत्कालीन कारीगर मूर्ति का निर्माण करते थे, जो हजारों साल बीतने के बाद भी उसकी कारीगरी देखने को बनती है, 



आप अभी भी इस मूर्ति को देखिए एक-एक नक्काशी आज भी हूबहू झलक रही है तो सोचिए उस समय कोई भी आधुनिक उपकरण नहीं रहने के बावजूद भी किस तरह से और किस औजार के द्वारा ऐसी कलाकृति का निर्माण किया जाता रहा होगा। अगर इस संबंध में आप गूगल पर सर्च करेंगे तो आप लिखा हुआ देखेंगे की (मधेपुरा शहर से लगभग २२ किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में स्थित श्रीनगर एक गांव है। इस गांव में दो किले हैं। माना जाता है कि इनसे से एक किले का इस्तेमाल राजा श्री देव रहने के लिए किया गया था। किले के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर दो विशाल कुंड स्थित है; पहले कुंड को हरसैइर और दूसर कुंड को घोपा पोखर् के नाम से जाना जाता है। 


इसके अतिरिक्त यहां एक मंदिर भी है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में स्थित पत्थरों से बने स्तंभ इसकी खूबसूरती को और अधिक बढ़ाते हैं।) गूगल पर सर्च करने के बाद श्रीनगर के बारे में बस इतना ही जानकारी मिल पाती है जबकि अगर इस क्षेत्र का खुदाई किया जाए और रिसर्च किया जाए तो स्वर्णिम युग की पहचान आज की आधुनिक युग को प्राप्त होगी जबकि आज तक मधेपुरा जिले को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पूरी तरह से पिछड़ा हुआ इलाका कहा जाता रहा है लेकिन श्रीनगर की खुदाई कर दी जाती है और वहां के अवशेष से जब जानकारी ली जाएगी तो यह पूरा क्षेत्र जो अपने उन्नत और वैभवशाली इतिहास के बारे में जब बताएगी तो हम कह सकते हैं की मधेपुरा, जिसे पिछड़ा हुआ क्षेत्र कहा जाता रहा है और इस जानकारी के बाद जरूर मधेपुरा अपने इतिहास को बदलकर रख देगा और देशवासियों को जानकारी प्राप्त होगा कि यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ नहीं बल्कि बहुत ही वैभवशाली क्षेत्र रहा है। 




मधेपुरा लाइव न्यूज़ और कोशी तक हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे पूर्व डीएम मोहम्मद सोहेल साहब और इस समय के तत्कालीन सीओ सतीश कुमार का जो इन दोनों के अथक मेहनत से श्रीनगर के इस वैभवशाली संस्कृति का पता चल पाया, नहीं तो आज भी यह क्षेत्र गुमनामी के अंधेरे में डूबा हुआ रहता, ऐसे में वर्तमान डीएम विजय प्रकाश मीणा से हम सभी उम्मीद कर सकते हैं की पूर्व के डीएम मो सोहेल साहब के कार्यों को आगे बढ़ते हुए, इस खुदाई कार्य को प्रारंभ करें और मधेपुरा के उन्नत और वैभवशाली संस्कृति से पूरी दुनिया को रूबरू करवाएं और बताएं कि मधेपुरा पिछड़ा हुआ क्षेत्र कभी नहीं रहा है बल्कि यह पूर्णत: उन्नत और वैभवशाली क्षेत्र रहा है। 


साथ ही पूर्व जिलाधिकारी मो सोहेल साहब के समय में इस पूरे क्षेत्र को देखभाल के लिए रखा गया एक कर्मी भोला दास के भी अथक प्रयास को हम सभी प्रणाम करते हैं कि उन्होंने कई वर्षों से इस क्षेत्र में रहकर एक-एक धरोहर को सहेज कर रख रहे हैं और जहां भी कोई मूर्ति निकलता है उसे तुरंत सहेजने का काम करते हैं, ऐसे में जिला प्रशासन से हम मांग करेंगे कि जब भी इस क्षेत्र में विकास की गाथा लिखी जाए तो भोला दास के अथक मेहनत को भी ध्यान में रखते हुए उसे भी सरकारी प्रहरी के तौर रखा जाए।

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