कोशी गौरव सम्मान महोत्सव में सजा प्रतिभाओं का मंच, मधेपुरा के निखिल और स्नेहा सम्मानित

 निखिल और स्नेहा को लोक संस्कृति में कोशी गौरव सम्मान मिला 


कोशी तक/ मधेपुरा:- कोशी गौरव सम्मान महोत्सव 2026 में विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं का भव्य मंच सजा, जहां कला, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले कलाकारों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर मधेपुरा के युवा रंगकर्मी निखिल कुमार और स्नेहा कुमारी को लोक संस्कृति एवं नाटक कला में अहम योगदान के लिए सर्वोदय समाज, कटिहार द्वारा ‘कोशी गौरव सम्मान 2026’ से सम्मानित किया गया।

निखिल कुमार, मधेपुरा जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत परड़िया गांव के निवासी हैं, जबकि स्नेहा कुमारी जिला मुख्यालय की रहने वाली हैं। दोनों कलाकार सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्था ‘सृजन दर्पण’ से जुड़े हुए हैं और लोक संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए लगातार सक्रिय हैं।

निखिल और स्नेहा ने रंगमंच और लोक संस्कृति के बीच बेहतरीन समन्वय स्थापित करते हुए विलुप्त हो रही परंपराओं को पुनर्जीवित करने का सराहनीय प्रयास किया है। वे अपने नृत्य और नाटक के माध्यम से संत कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।

नृत्य गुरु एवं रंग निर्देशक विकास कुमार के निर्देशन में दोनों कलाकारों ने भारत सरकार और बिहार सरकार द्वारा आयोजित विभिन्न महोत्सवों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सराहना हासिल की है। साथ ही, कला उत्सव, राजकीय युवा उत्सव और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर भी लोक संस्कृति का परचम लहराया है।

कार्यक्रम के दौरान आयोजित सांस्कृतिक प्रस्तुति में मधेपुरा सहित कोशी क्षेत्र के कलाकारों ने गीत, संगीत, नृत्य और ‘विदेशिया’ नाटक की मनमोहक प्रस्तुति दी, जिसने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। इस अवसर पर नृत्य गुरु विकास कुमार, लोकगायिका अनुप्रिया यादव, निखिल यदुवंशी, स्नेहा कुमारी, नैंसी कुमारी और राधिका कुमारी सहित कई कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से कार्यक्रम में चार चांद लगा दिया।

समारोह में सभी कलाकारों को अतिथियों द्वारा अंगवस्त्र एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। निखिल कुमार और स्नेहा कुमारी को कोशी गौरव सम्मान मिलने पर शिक्षाविदों और कला प्रेमियों ने हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी है।

दोनों कलाकारों ने कहा कि गीत, संगीत, नृत्य और नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपरा को जीवित रखने का सशक्त माध्यम है।

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