सरकार के सख्ती का असर: 15 दिन से अधिक समय से स्कूल नहीं आने वाले अबतक 8500 से ज्यादा के बच्चों का कटा नाम



 


मधेपुरा।

 15 दिनों से अधिक समय से लगातार स्कूल नहीं आने वाले या दो से अधिक स्कूलों में नामांकन करा कर सरकारी योजना का लाभ उठा रहे बच्चों के नाम काटा जा रहा है। अब तक 8500 से ज्यादा छात्रों का नाम स्कूलों से कट रहा है। मालूम हो कि लगभग एक माह पूर्व  शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक ने यह निर्देश जारी किया था। उसके बाद  वैसे बच्चों का नाम काटने की कार्रवाई शुरू हुई जो लगातार 15 दिन से अपने स्कूलों से अनुपस्थित रहे। अपर मुख्य सचिव के निर्देश के बाद डीईओ कार्यालय ने सभी स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थिति 75 प्रतिशत अनिवार्य कर दी गई थी। इसके तहत स्‍कूलों  में विद्यार्थियों की उपस्थिति पर पैनी नजर रखी जा रही है। विभाग के इस फैसल के बाद अभिभावक समेत बच्चों में हड़कंप मचा है। विभाग के इस आदेश के बाद से शिक्षक भी पूरे मामले को लेकर काफी गंभीर दिख रहे हैं। डीईओ ने स्पष्ट किया कि स्‍कूलों में अब बच्‍चों की उपस्थिति पर विभाग की पैनी नजर है। फर्जी बच्चों पर हमलोग नियमित रूप से मोनेटरिंग कर रहे हैं। वहीं दो स्कूल में नामांकित छात्रों को चिह्नित कर उनका दाखिला रद्द किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पहले तीन दिन लगातार गायब रहने वाले छात्रों को प्रधानाध्यापक द्वारा नोटिस भेजा गया। नोटिस के बाद नहीं आने पर 15 दिन बाद उसका नाम काटा जा रहा है। जानकार बताते हैं कि सरकार के इस फैसले के बाद जिले में फर्जी नामांकन पर काफी हद तक रोक लगने की संभावना है। जिससे सरकार का बर्बाद हो रहे विभिन्न योजना में व्यय हो रहे राशि की भारी बचत होगी। जानकार बताते हैं कि सरकार लाख प्रयास के बाद भी 50 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में बच्चों की संख्या 50 प्रतिशत को पार नहीं कर पा रहा था। 


वहीं सरकार के आदेश का असर है कि अब अधिकतर स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति 75%  को भी पार कर रहा है। हालांकि जानकार बताते हैं कि अभी भी 20% स्कूल ऐसे हैं जहां छात्रों की उपस्थिति नहीं बढ़ रही है। जो कि चिंता का विषय है। केवल मधेपुरा शहर में एक दर्जन से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां अभी भी बच्चों की संख्या 50% को पार नहीं कर रही है। लेकिन वहां के शिक्षकों पर सरकार का दो लाख से ज्यादा प्रतिमाह केवल सैलरी पर खर्च हो रहा है। सरकार की इस सख्ती से राजस्व का बड़ा नुकसान कम हुआ है। जानकार की माने तो अगर ऐसे फर्जी छात्रों पर और सख्ती हुई तो जहां पूरे जिले में नामांकित छात्रों की संख्या 3.5 लाख के आसपास हो जाएगी। जो वर्तमान में 4.5 लाख के आसपास है। वहीं सरकार को प्रतिवर्ष 2 अरब से ज्यादा का राजस्व बचेगा। वहीं एमडीएम में लूट जगजाहिर है।




 सेवानिवृत एचएम वीरेन्द्र यादव बताते हैं कि अगर बच्चों की संख्या सरकारी स्कूलों में कम रहती है तो इसके लिए अभिभावक ज्यादा जिम्मेदार है। वे कहते हैं कि सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए अभिभावक सरकारी स्कूलों में नामांकन करवा तो देते हैं लेकिन वो वहां नहीं भेजकर निजी स्कूलों में भेजते हैं। वहीं जिन बच्चों का आधार लिंक नहीं हुआ है वो एक से ज्यादा स्कूलों में बच्चों का नाम लिखाए हुए है। वे कहते हैं कि शिक्षा का अधिकार कानुन के तहत सरकारी स्कूल के एचएम ऐसे बच्चों का नामांकन लेने को मजबूर है। जिसका फायदा ऐसे अभिभावक उठा रहे हैं। इतना ही नहीं इस मामले में सरकारी स्कूल बदनाम हो रहे हैं। 


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